जबलपुर के बुनकर, बेरोज़गार युवा और ‘भारत पावरलूम’ की हकीकत

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जबलपुर के बुनकर, बेरोज़गार युवा और ‘भारत पावरलूम’ की हकीकत

 

जबलपुर की पहचान कपड़े के व्यापार से जुड़ी रही है। बुनकर, पावरलूम, करघों की आवाज़ और मेहनतकश हाथों की बदौलत यहां की अर्थव्यवस्था ने दशकों तक सांस ली है। लेकिन आज सवाल यह है कि जबलपुर का यही बुनकर वर्ग क्यों हाशिए पर है?

‘भारत पावरलूम’…. एक नाम, एक संस्था, जो कागज़ों पर बड़ी, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में लगभग बेजान।
गाज़ीबाग में बनी यह संस्था, जिसे बुनकरों की रीढ़ कहा गया, उसका इस्तेमाल पावरलूम सेक्टर के लिए मुश्किल से एक प्रतिशत भी नहीं हो रहा।

तीन साल में अध्यक्ष ने काम तो किया, मगर काम किसके लिए? बुनकरों के लिए या अपने निजी स्वार्थ और वर्चस्व के लिए? गाज़ीबाग का ‘भारत घर’…. बारात और भोज के लिए तैयार की गई एक इमारत। और उसी इमारत में, दो वक्त बिना बुलावे की दावत उड़ाते हुए, पैक करवाकर घर ले जाते हुए वही अध्यक्ष दावा करते हैं…. “मैंने ही बुनकरों को वार्पिंग मशीन देकर ‘भीम’ बनाया, वरना जबलपुर की बुनकरी कब की ख़त्म हो जाती।”

लेकिन, हक़ीक़त?
असल बुनकर, जिनकी संख्या 36 से 38 के बीच है, साफ कहते हैं कि अध्यक्ष के दावे 90 प्रतिशत झूठ हैं। मुश्किल से दो–तीन बुनकर मजबूरी में उनसे भीम खरीदते हैं…. और यह लेन-देन संस्था का नहीं, उनका निजी व्यापार है।

तो फिर सवाल यही है….
क्या ‘भारत पावरलूम’ बुनकरों के लिए है, या किसी निजी साम्राज्य का पिछवाड़ा?
क्या बुनकरों का हक़, उनका श्रम और उनका भविष्य, सिर्फ़ बारात घर की दीवारों और निजी कारोबार में कैद होकर रह गया है?

यह रिपोर्ट सिर्फ़ एक संस्था की नाकामी नहीं, बल्कि उस बेरोज़गार युवा की पीड़ा है, जो अपने हुनर के बावजूद बाज़ार में जगह नहीं बना पा रहा।
जबलपुर की बुनकरी अगर बचेगी, तो सच्चाई और पारदर्शिता के साथ…. वरना झूठ और दिखावे के सहारे, सिर्फ़ खोखले दावे ही बुनते रह जाएंगे।

 

“जबलपुर की बुनकरी और ‘भारत पावरलूम’ की सच्चाई : दूसरा हिस्सा”

 

वार्पिंग…. यानी वह कॉमन मशीन जो हर बुनकर के पास होनी चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि जगह की कमी के चलते कोई भी बुनकर अपनी मशीन नहीं लगा पा रहा। यही कारण है कि असली बुनकर जमीन की मांग कर रहे हैं…. ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें, अपनी मशीनें लगा सकें और बुनकरी को नई ज़िंदगी दे सकें।

और दिलचस्प यह है कि यही वादा चुनाव जीतने से पहले संस्था के अध्यक्ष ने किया था। कहा था…. “हर बुनकर को ज़मीन मिलेगी, हर घर में मशीन लगेगी।” लेकिन सत्ता मिलने के बाद वही अध्यक्ष और उनके कागज़ी बुनकर अब कहते हैं…. “ज़मीन बहुत कीमती है, एक इंच भी नहीं देंगे।”

यानी चुनावी मंच पर किए गए वादे, दरअसल मंच पर छोड़े गए खोखले नारों से ज्यादा कुछ नहीं थे।

2021…. कोरोना के बाद की कहानी
महामारी ने सबको तोड़ा, लेकिन इसी दौर में जबलपुर का पावरलूम सेक्टर नई करवट लेने लगा। डूब चुके बुनकर फिर से खड़े हुए। उनकी मेहनत से बनी साड़ियां पूरे दक्षिण भारत में “जबलपुर ब्रांड” के नाम से बिकने लगीं। जनवरी से जून तक तो हालत यह रहती है कि इन साड़ियों की शॉर्टेज हो जाती है।

सवाल यह है….
जब असली बुनकर अपने हुनर से न सिर्फ़ अपना बल्कि जबलपुर का नाम भी रोशन कर रहे हैं, तो संस्था क्यों उनकी पीठ नहीं थपथपाती? क्यों उनकी राह आसान करने के बजाय रोड़े अटकाती है?

भारत पावरलूम…. या भारत घर?
आज यह संस्था बुनकरों की रीढ़ बनने के बजाय गाज़ीबाग का ‘भारत घर’ बनकर रह गई है।

कागज़ पर 284 सदस्य दर्ज हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें से 275 सदस्य असली बुनकर हैं ही नहीं। बच जाते हैं सिर्फ़ 18…. और इनकी कोई सुनवाई ही नहीं। उल्टा, लगभग 20 असली बुनकर तो सदस्य बनाए ही नहीं जा रहे। सवाल उठता है…. क्यों?
क्या इसलिए कि असली बुनकर संस्था की खोखली राजनीति पर पर्दा डाल देंगे?
जबलपुर की बुनकरी बुनकरों के बूते ही जिंदा है, न कि संस्था के दावों पर।
लेकिन संस्था के भीतर बैठी राजनीति, असली बुनकरों को किनारे कर, नकली कागज़ी बुनकरों के नाम पर ज़मीन और हक़ निगल रही है।

 

“जबलपुर की बुनकरी और ‘भारत पावरलूम’ का सच : तीसरा हिस्सा”

 

फर्ज़ी सदस्य क्यों बनाए गए?
असली बुनकरों का कहना है…. वजह साफ़ है। ताकि हर पाँच साल में होने वाले चुनावों को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ मैनेज किया जा सके। और फिर वही “मनचाहा” अध्यक्ष, बार-बार, कुर्सी पर बैठा रहे।

यह केवल संस्था के लोकतंत्र की हत्या नहीं, बल्कि उस भरोसे की भी लूट है, जो बुनकरों ने कभी इस संस्था पर जताया था।

बुनकरों का सपना…. और जबलपुर का भविष्य
असली बुनकर मानते हैं कि अगर भारत पावरलूम का इस्तेमाल ईमानदारी से पावरलूम सेक्टर के लिए कर दिया जाए, तो जबलपुर की टेक्सटाइल मार्केट में एक बूम आ सकता है।
उनका विश्वास है कि….

  • जबलपुर की टेक्सटाइल मार्केट को सूरत, अहमदाबाद, लुधियाना और पानीपत की बराबरी पर खड़ा किया जा सकता है।
  • जबलपुर में स्पिनिंग मिल खोली जा सकती है।
  • और तब धागा और कपड़ा, “जबलपुर ब्रांड” के नाम से पूरी दुनिया में बिकेगा।

यह सपना केवल व्यापार का नहीं है, बल्कि लाखों युवाओं के रोज़गार का है। आने वाले 10–15 वर्षों में, यही सेक्टर जबलपुर को हज़ारों नहीं, बल्कि लाखों रोज़गार देने वाला हब बना सकता है।

लेकिन…
संस्था का चेहरा और चाल कुछ और कहता है।
छह महीने पहले कलेक्टर साहब को दिखावे के लिए बंद मशीनें दिखाई गईं। नाटक रचा गया। और फिर केवल ड्रामा बढ़ाने के लिए दो नई मशीनें और लगवाई गईं। मगर आज तक वे मशीनें चालू नहीं हुईं।

वही असली बुनकर कहते हैं….
“ये मशीनें हमें दे दीजिए, हम 15 दिन में इन्हें चालू कर देंगे। और इन पर वही हर किस्म का कपड़ा तैयार कर देंगे, जो आप और हम पहनते हैं। वो भी आधे दाम पर।”

यानी असली क्षमता बुनकरों के पास है, लेकिन सत्ता और संसाधनों पर कब्ज़ा उन हाथों में है जिन्हें सिर्फ़ कुर्सी प्यारी है।

“जबलपुर की बुनकरी और ‘भारत पावरलूम’ की जद्दोजहद : चौथा और अंतिम हिस्सा”

 

एक समय था….सन् 1970।
जबलपुर का पावरलूम सेक्टर इतना आगे था कि सूरत, पानीपत, लुधियाना और अहमदाबाद भी उसके मुकाबले छोटे दिखते थे। यहां की मशीनें, यहां का हुनर और यहां का कपड़ा देश की शान माना जाता था।

मगर समय बदला। और बदला इसलिए क्योंकि पावरलूम की कोई भी संस्था….कोई भी सोसायटी….असल में बुनकरों के लिए काम करने निकली ही नहीं।
परिणाम साफ़ है….जबलपुर का कभी दमदार रहा कपड़ा उद्योग धीरे-धीरे मिटता चला गया।

अब हालात
आज जबलपुर के सेंटर प्वाइंट पर बची है सिर्फ़ यह आखिरी ज़मीन…. भारत पावरलूम की। और यह ज़मीन ही भविष्य की चाबी हो सकती है।

असली बुनकर साफ़ कहते हैं….

  • इस कमेटी को भंग किया जाए।
  • फालतू और फर्ज़ी लोगों को बाहर निकाला जाए।
  • भारत पावरलूम को असली बुनकरों और काम करने वालों से जोड़ा जाए।
  • और अध्यक्ष वही बने जो पावरलूम सेक्टर को तरक्की की राह पर ले जा सके।

भविष्य का खाका
बुनकरों की नई पीढ़ी के सामने चुनौती है, लेकिन उम्मीद भी है।
अगर नेतृत्व ईमानदार हुआ, तो यह सेक्टर….

  • नई पीढ़ी को रोज़गार दे सकता है।
  • जबलपुर को फिर से टेक्सटाइल हब बना सकता है।
  • और बुनकरों को एडवांस तकनीक से लैस कर, देश-दुनिया के बाज़ार में खड़ा कर सकता है।

सवाल वहीं खड़ा है
क्या भारत पावरलूम, गाज़ीबाग का “बारात घर” बनकर रह जाएगा?
या फिर यह संस्था खुद को सचमुच बुनकरों की ताक़त में बदल पाएगी?

रिपोर्ट मोहम्मद अकरम अंसारी 

नकली सदस्य और उनकी लिस्ट

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