डिंडोरी की वसूली डायरी: शहपुर थाने में ट्रक रुकते हैं, कानून नहीं
नर्मदा की पावन धारा और डिंडोरी की ज़मीन को शराबबंदी का वरदान मिला था। लेकिन ज़रा शहपुर थाना देख लीजिए….यहाँ शराबबंदी तो बस सरकारी फाइलों में है, हकीकत में जो चलता है, उसे स्थानीय लोग खुलकर कहते हैं….“यहाँ कानून नहीं, वसूली का ठेका चलता है।”
सुबह-सुबह का मंज़र देख लीजिए। ट्रकों की लंबी कतार, धूल में खड़े चालक, और सामने वही खाकी वर्दी… पर ये वर्दी अब अपराध रोकने की नहीं, “मोल-भाव तय करने” की पहचान बन चुकी है।
थाना प्रभारी साहब खुद सुबह की ‘ड्यूटी’ पर होते हैं….जहाँ ट्रकों से वसूली की रसीद काटी जाती है, लेकिन बिना कागज़ और बिना रिकॉर्ड।
ट्रक के बहाने, नकदी की फसल
नया छत्तीसगढ़ बनने के बाद इस रास्ते से बड़े-बड़े ट्रक गुज़रते हैं। माल कितना है, वैध है या अवैध….ये सब सवाल बस बहाने हैं। असली खेल है पैसे की वसूली।
- किसी कागज़ पर कमी निकल आई तो तुरंत चालान नहीं, बल्कि “समझौते” का रेट तय होता है।
- कोई ट्रक ज़्यादा सामान लेकर निकल गया तो चालान नहीं, बल्कि सीधे “सेवा शुल्क” वसूला जाता है।
- और जो ट्रक चालकों ने तर्क किया, उनके लिए रास्ता और भी महँगा हो जाता है।
स्थानीय लोग कटाक्ष करते हैं….“यह थाना नहीं, सुबह-सुबह लगने वाला मिनी-टोल नाका है।”
शराबबंदी….बस धुएँ की ओट
यहाँ शराबबंदी की चर्चा सिर्फ़ परदे के पीछे की कहानी है। असल कारोबार है ट्रक और उससे होने वाली रोज़ाना वसूली। शराब अवैध है, पर उससे भी ज़्यादा अवैध है वह चुप्पी, जो पुलिस की जेब में बिक जाती है।
असर गाँव और बाज़ार पर
यह वसूली किसी एक चालक की जेब नहीं काटती, बल्कि पूरे ज़िले की अर्थव्यवस्था को खोखला करती है। ट्रांसपोर्ट महँगा होता है, लागत बढ़ती है और अंततः बोझ किसानों-व्यापारियों और उपभोक्ताओं तक पहुँचता है। यानी जो पैसा सड़क पर खाकी की जेब में जाता है, वही रकम गाँव की थाली से रोटी कम कर देता है।
असली सवाल
अब प्रश्न यह नहीं कि डिंडोरी में शराब बिक रही है।
असली सवाल यह है कि क्या डिंडोरी में कानून बिक रहा है?
अगर वही प्रहरी, जिसे क़ानून की रक्षा का जिम्मा सौंपा गया है, रोज़ सुबह वसूली की चौकी चला रहा हो, तो फिर जनता किस दरवाज़े पर दस्तक दे?
वरिष्ठ अधिकारियों को चाहिए कि इस पूरे तंत्र की निष्पक्ष जांच कराएं। अन्यथा डिंडोरी की पहचान नर्मदा की आस्था से नहीं, बल्कि सड़क किनारे होने वाली सरेआम वसूली से होगी।
और यह सच किसी भी समाज के लिए शराब से भी कहीं बड़ा नशा है….क्योंकि यह नशा सीधे सत्ता और वर्दी की लत से पैदा होता है।