जनसुनवाई बनी मज़ाक…? सीएम हेल्पलाइन में भी चल रहा गोलमाल …. जन समस्याओं के निराकरण के अभियान बने शोपीस!
जनसुनवाई बनी मज़ाक…?
सीएम हेल्पलाइन में भी चल रहा गोलमाल …. जन समस्याओं के निराकरण के अभियान बने शोपीस!
रेवांचल टाइम्स मंडला।
मध्य प्रदेश के मंडला जिले में जनसुनवाई अब जनसुनी-अनसुनी बन चुकी है। शासन के तमाम दावे और पोस्टरबाज़ी के बावजूद, हकीकत ये है कि जनता की आवाज़ न तो सुनाई दे रही है, न ही उस पर कोई कार्रवाई हो रही है।
हर मंगलवार को जिले में जनसुनवाई कार्यक्रम आयोजित होता है …. पर सवाल ये है कि क्या ये कार्यक्रम सिर्फ़ कुर्सियों, बैनरों और फोटोशूट तक सिमट गया है?
लोग आते हैं, अपनी समस्याएं बताते हैं, आवेदन देते हैं …. लेकिन जवाब में मिलता है सिर्फ़ देख लेंगे, भेज दिया गया है, या कार्यवाही जारी है जैसा गोलमोल जवाब।
आवेदन पत्रों का कोई ट्रैक नहीं, न ही किसी को यह बताया जाता है कि उसका निराकरण हुआ भी या नहीं।
सीएम हेल्पलाइन में भी वही कहानी, वही भ्रष्ट तंत्र।
यहाँ भी निराकरण का मतलब है …. ओटीपी डालो और फाइल बंद करो!
शिकायत करने वाला समझे कि उसका मामला सुलझ गया, लेकिन असल में सब कुछ जस का तस।
कई मामलों में तो अधिकारियों के निवेदन पर शिकायतें बंद करा दी जाती हैं। यानी जनता की आवाज़ को सिस्टम ने मैनेज कर लिया है।
सबसे बड़ा रोल यहाँ निभा रहा है राजस्व विभाग, जहाँ शिकायतें कागज़ों पर सुलझा दी जाती हैं और सिस्टम में दिखा दिया जाता है …. कार्य पूर्ण।
लेकिन ज़मीनी हकीकत? खेत वहीं अधूरे, फाइल वहीं अटकी, और अफसरों के चेहरे पर वही बेशर्मी की मुस्कान।
अब सवाल उठता है …. आखिर ये योजनाएँ किसके लिए हैं?
जनसुनवाई का मकसद जनता की सुनवाई था, लेकिन अब ये व्यवस्था अफसरों के अहंकार और लापरवाही की ढाल बन चुकी है।
और शासन? बस समीक्षा बैठकों के नाम पर खानापूर्ति में व्यस्त।
मंडला का हाल अब ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ से कम नहीं।
जनता उम्मीद करती है कि शासन कम से कम पिछले दो वर्षों की जनसुनवाई और सीएम हेल्पलाइन के निराकरण की जांच तो कराए …. ताकि पता चल सके कि ये निराकरण जनता का हुआ या सिर्फ़ फाइलों का।