शिक्षा विभाग में बढ़ता भ्रष्टाचार….नौनिहालों के हक पर डाला जा रहा है डाका

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला, आदिवासी बाहुल्य मंडला में सरकार एक ओर जहाँ शिक्षा के स्तर को सुधारने और हर बच्चे तक शिक्षा की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए लाखों करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। तो वहीं दूसरी ओर शिक्षा विभाग के अंदर बैठे कुछ भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी इस नेक प्रयास पर पानी फेरने में लगे हुए हैं। हालात ऐसे हैं कि नौनिहालों के हक़ का धन इनके भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। और जो अधिकारी ईमानदारी से काम करना चाहते हैं, उन्हें विभाग द्वारा तंग कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
सरकार की मंशा नेक है लेकिन व्यवस्था में ‘जड़ जमाए अजगर रूपी भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा सरकार की शिक्षा के प्रति नेक मंशा के ऊपर पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही हैं।
राज्य सरकार का दावा है कि वह शिक्षा व्यवस्था को लेकर पूरी तरह सजग और गंभीर है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती की जा रही है। अध्ययनरत बच्चों को छात्रावासों की सुविधा दी जा रही है। मध्यान्ह भोजन योजना से और बच्चों को स्कूली ड्रेस एवं अन्य माध्यमों के द्वारा सशक्त बनाया जा रहा है,। ताकि कोई बच्चा छूट न पाए हर बच्चा स्कूल जाए और अंतिम छोर तक के बच्चे शिक्षा से वंचित न रहें। लेकिन ज़मीनी हकीकत सरकार की नीतियों को चुनौती देती नज़र आ रही है। आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला में शिक्षा विभाग के अंदर ऐसा भ्रष्टाचार फैल चुका है कि कुछ कर्मचारी ‘अजगर’ की तरह एक ही जगह वर्षों से जमे हुए हैं। न वे स्थानांतरण होने देते हैं, न ही किसी नई व्यवस्था को लागू होने देते हैं। सूत्रों से जानकारी अनुसार जिले के कई छात्रावासों में अधीक्षक दस-दस वर्षों से अधिक एक ही स्थान पर डटे हुए हैं। विभाग के अंदर यह कहावत मशहूर हो चुकी है — “जो लिफ़ाफ़ा पहुँचाता है, वही टिकता है।”

कमीशन का खेल और ईमानदारों की दुर्गति

सूत्रों की मानें तो जिले में नियुक्तियों और तबादलों में खुलेआम कमीशन का खेल चल रहा है। जो अधिकारी या कर्मचारी“ऊपर तक पहुँच” बना लेता है, उसे मनमाफिक पदस्थापना मिल जाती है। वहीं जो लोग ईमानदारी से कार्य करना चाहते हैं, उन्हें या तो हाशिये पर डाल दिया जाता है या स्थानांतरण की धमकी दी जाती है।
एक वरिष्ठ शिक्षक ने नाम न बताने की शर्त पर बताया यहाँ पदस्थापना योग्यता से नहीं, जेब से तय होती है। जो जितना देगा, उसे उतना बेहतर स्थान मिलेगा। बाकी को परेशान किया जाएगा।”

छात्रावासों में अनियमितताएँ और फर्जीवाड़ा

छात्रावासों का उद्देश्य गरीब और पिछड़े वर्ग के बच्चों को सुरक्षित व बेहतर शिक्षा वातावरण उपलब्ध कराना है। परंतु जिले में यह उद्देश्य भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। कई छात्रावासों में न तो बच्चों के लिए अधीक्षकों के द्वारा पर्याप्त भोजन की व्यवस्था की जा रही है, न ही साफ-सफाई का ध्यान रखा जा रहा है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कुछ अधीक्षक हर महीने विभाग के उच्च अधिकारियों तक ‘नज़राना’ पहुँचाते हैं, जिसके कारण उन्हें वर्षों से एक ही पद पर टिके रहने की छूट मिली हुई है। बच्चों के नाम पर आने वाला राशन, स्टेशनरी, बिस्तर, कॉपी, किताब, पेंसिल, और यूनिफॉर्म तक में हेराफेरी की जा रही है।

गुणवत्ता रहित निर्माण कार्य और करोड़ों की बंदरबांट

नारायणगंज ब्लॉक में हाल ही में करोड़ों रुपये की लागत से एक छात्रावास भवन का निर्माण कराया गया। सरकार का उद्देश्य था कि ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को बेहतर आवासीय सुविधा मिले। लेकिन निर्माण कार्य पूरा होते ही इमारत की दोनों मंज़िलों की छतें बारिश में टपकने लगीं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि भवन निर्माण में घटिया सामग्री का प्रयोग किया गया है। जांच के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है, जबकि असल में निर्माण कार्य की गुणवत्ता बेहद निम्न स्तर की थी।“सरकारी धन का खुला दुरुपयोग हो रहा है। रिपेयरिंग और मेंटेनेंस के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बिल बनाया जाता है, लेकिन हालत जस की तस रहती है। कहीं न कहीं यह पूरा खेल मिलीभगत का परिणाम है।”
पुराने मामले अब भी सुलझे नहीं
शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार की यह पहली कहानी नहीं है। पूर्व में जनपद घुघरी में एक शिक्षिका द्वारा छात्रों से जूते साफ़ करवाने का मामला सामने आया था। उस वक्त भी प्रशासन ने जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती की थी। आरोपित शिक्षिका पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि कुछ समय बाद नज़राना की अदायगी के बाद में उसे पुनः पदस्थापित कर दिया गया।बर्तमान में जूनियर आदिवासी कन्या आश्रम गिठार अधीक्षिका शुर्मिला कुशरे पर बच्चियो आए हाथ पैर दबाने और प्रताणित करने के आरोप बच्चो और उनके अभिभावकों के द्वारा लगाए गए थे जो वरिष्ठ अधिकारियों के द्वारा निलंबन की कार्यवाही कर घुघरी में अटैच कर दिया है ऐसे कई मामले हैं जहाँ शिकायतों की फाइलें जांच दफ्तरों में वर्षों से धूल फाँक रही हैं।

नौनिहालों का भविष्य दांव पर

सबसे अधिक नुकसान उन मासूम बच्चों का हो रहा है, जिनके भविष्य को सँवारने का जिम्मा यही विभाग उठाता है। छात्रावासों में रह रहे बच्चों को पौष्टिक भोजन, स्वच्छ पानी और सुरक्षित वातावरण मिलना चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से ये सुविधाएँ कागज़ों में सिमट कर रह गई हैं।बहुत से हॉस्टलों में बच्चों को शासन के मेन्यू के हिसाब से भोजन नही मिलता तो कहीं पर यूनिफॉर्म महीनों की देरी से पहुँचती है। और किताबें समय पर नहीं मिलतीं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार द्वारा दी जा रही योजनाओं का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है बच्चों को या भ्रष्ट अधिकारियों को?

प्रशासनिक अमला क्यों मौन है?

सरकार की नीतियाँ स्पष्ट हैं — पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन। बावजूद इसके जब निचले स्तर पर इस तरह की गड़बड़ियाँ हो रही हैं
क्या भ्रष्टाचार करने वालों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है या फिर अधिकारियों ने चुप्पी साध ली है क्योंकि ऊपर से भी हिस्सा पहुँचता है
नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है — “भ्रष्टाचार पर कार्रवाई तभी संभव है जब राजनीतिक इच्छाशक्ति हो। जब तक ऊपर से कड़ा संदेश नहीं जाएगा, तब तक नीचे के अधिकारी मनमानी करते रहेंगे।

ईमानदार अधिकारियों को क्यों नहीं संरक्षण?

कई बार ऐसे अधिकारी कर्मचारियों जो ईमानदारी से काम करना चाहते हैं, उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। उन्हें अनुशासनहीनता या कार्य में असंतोषजनक प्रदर्शन” जैसे आरोपों में फँसाकर दूर-दराज़ क्षेत्रों में ट्रांसफर कर दिया जाता है।
यही वजह है कि धीरे-धीरे विभाग में ईमानदार अधिकारियों कर्मचारियों की संख्या कम होती जा रही है, और भ्रष्टाचारियों का नेटवर्क मजबूत होता जा रहा है।

शासन की भूमिका और अपेक्षित कदम

राज्य सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार सिर्फ आर्थिक हानि नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध भी है। जब बच्चों का हक छीना जाता है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से खिलवाड़ होता है।जरूरत इस बात की है कि
लंबे समय से एक ही स्थान पर जमे अधिकारियों का अनिवार्य तबादला किया जाए।छात्रावासों और विद्यालयों की थर्ड पार्टी से जांच कराई जाए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आए।
भ्रष्टाचार की शिकायतों पर त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई की जाए।
जनप्रतिनिधियों और नागरिक समाज की निगरानी बढ़ाई जाए, ताकि योजनाओं का लाभ वास्तव में बच्चों तक पहुँच सके।

शिक्षा सभ्य समाज की रीढ़ की हड्डी हैं जिस आधार पर एक सभ्य समाज की दिशा और दशा तय होती है। यदि यही व्यवस्था भ्रष्टाचार की जकड़ में आ जाए, तो राष्ट्र का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। सरकार भले ही नई योजनाएँ और नीतियाँ बनाती रहे, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर बैठे भ्रष्टाचारियों पर नकेल नहीं कसी जाती, तब तक नौनिहालों की हालत सुधरने की उम्मीद व्यर्थ है।
क्या कोई वरिष्ठ जनप्रतिनिधि या वरिष्ठ अधिकारी इस भ्रष्टाचार की सड़न को साफ़ करने की हिम्मत जुटा पाएंगे, या फिर नौनिहालों का हक इसी तरह भ्रष्टाचार की बलि चढ़ता रहेगा।
इनका कहना
गिठार कन्या आश्रम की अधीक्षिका के ऊपर निलंबन की कार्यवाही कर घुघरी में अटैच किया गया है और जो अधिक्षिक एक ही जगह वर्षों से जमे हुए है उन्हें भी हटाने की कार्यवाही की जायेगी ।
वंदना गुप्ता
सहायक आयुक्त मंडला

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