एक जवाज जवान की जीवन गाथा कैसे चड़ी सिपाही से लेकर टी आई तक सीढ़ी

संग्राम सिंह धुर्वे का जीवनी संघर्ष, वीरता और सफलता की अमर गाथा

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दैनिक रेवाँचल टाईम्स – व्यक्ति सफलता यू ही जीवन में नहीं मिलती है । इसके लिए कठिन परिश्रम, त्याग सन्तों के जैसे तप और संघर्ष मजबूत सोच, एक लक्ष्य बनाने की आवश्यकता होती है। कुछ लोग विपरीत परिस्थितियों के आगे हार मान लेते हैं, तो कुछ लोग इन्हीं परिस्थितियों को सीढ़ी बनाकर शिखर पर चढ़ जाते हैं। अएसे ही प्रेरणादायक जीवनगाथा है संग्राम सिंह धुर्वे की, जिन्होंने गरीबी और कठिनाइयों से लड़ते हुए न केवल खेल जगत में अपना नाम दर्ज कराया, बल्कि पुलिस सेवा में रहते हुए नक्सल विरोधी अभियानों में अद्वितीय योगदान दिया पुलिस नक्सली मुठभेड़ में हमेशा नक्सलियों को लोहे का चना चबाया है। यही नहीं, वे गीत संगीत और समाज सेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान निभाते हैं । जिस क्षेत्र में थाना प्रभारी रहता है लोग उसके दिवाने हो जाते हैं और थाना प्रभारी के मुस्तैदी से क्षेत्र के लोग चैन का नींद सोते हैं।आज युवा पीढ़ी के लिए सच्ची प्रेरणा बने हुए हैं हर युवा साथी को इस जीवनी लेख को पढ़कर समझना चाहिए कि इरादा मजबूत हो तो सफलता कदम चूमती है।

(1) बचपन : मजबूरी गरीबी और अभावों में पला जीवन

03 मई 1975 को मध्यप्रदेश के शहडोल संभाग, जिला अनुपपुर, तहसील पुष्पराजगढ़, ग्राम पंचायत खेतगांव में जन्मे संग्राम सिंह धुर्वे एक साधारण गोंड आदिवासी परिवार से आते हैं। पिता श्री कुंवर सिंह धुर्वे और माता स्वर्गीय छोटी बाई धुर्वे के स्नेह और संस्कारों ने उन्हें मेहनत और ईमानदारी का मूल्य सिखाया मात-पिता का एकलौता और दुलारा बेटा होने के बाद भी वे गरीबी से हमेशा लड़ता करता रहता था।
गरीबी परिवार में जन्म होने के कारण बचपन अत्यंत कठिन रहा। छोटी सी उम्र से ही जीवन यापन और पढ़ाई का खर्च चलाने के लिए गर्मी के छुट्टियों में रोजी मजदूरी का काम करना पड़ता था और कठिन मेहनत से हाथों में फोड़ा और पैरों में छाले पड़ जाता था दिन में मजदूरी और रात में चिमनी के प्रकाश में पढ़ाई उनकी दिनचर्या थी और समय मिलते ही खेल कूद में भी कठिन मेहनत करता था।
ग्राम खेतगांव में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाई करने के बाद वो आगे की शिक्षा के लिए शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय लखौरा पहुँचे। यहाँ भी आर्थिक अभाव बना रहा। पर कभी भी नहीं माना बचपन से ही खेल कूद और गीत संगीत में काफी रुचि रखता था।

-(2) दौड़ का कठिन शुरुआत : मजबूरी से हुआ ।

गरीबी ने ही उन्हें दौड़ने का अभ्यास सिखाया। खेतगांव से लखौरा स्कूल की दूरी लगभग 22 किलोमीटर है । बस या टैक्सी के लिए पैसे नहीं होने के कारण वे जंगल पहाड़ी रास्तों से अक्सर यह दूरी दौड़कर तय करते थे। यही अभ्यास धीरे-धीरे उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।

विद्यालय में जब वे खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेते तो उनकी मेहनत रंग लाती और वे हमेशा मेडल जीतने लगे। सहपाठियों और शिक्षकों का उत्साह उन्हें और अधिक मेहनत करने के लिए प्रेरित करता था मेडल जीतने की खुशी और सम्मान ने उन्हें खेलों की ओर पूरी तरह मोड़ दिया।


(3)अमरकंटक क्रीड़ा परिसर ने संग्राम सिंह धुर्वे को खेलों का बेताज बादशाह बना दिया।

उनकी उभरती प्रतिभा को देखकर अमरकंटक क्रीड़ा परिसर के कोच पीटी आईयों के द्वारा शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय लखौरा आकर उन्हें क्रीड़ा परिसर अमरकंटक के लिए चयनित किया गया और अमरकंटक क्रीड़ा परिसर में भर्ती होने के बाद उन्हें विधिवत प्रकार की प्रशिक्षण दिया गया । वे कबड्डी, वॉलीबॉल, खो-खो, फुटबॉल, हॉकी, हैंडबॉल, बास्केटबॉल,गोला फेंक, भाला फेंक और लेकर 200 मीटर दौड़ से लेकर 42 किलोमीटर मैराथन तक में दक्ष हो गए।
कठोर परिश्रम और अनुशासन ने उन्हें आलराउंडर खिलाड़ी बना दिया। दसवीं पास करने के बाद पारिवारिक कारणों से उन्हें पुनः शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय लखौरा वापस लौटना पड़ा, लेकिन उनका खेलों के प्रति जुनून और कठिन मेहनत बरकरार रहा कभी बसहनिया से पिपरहा तक दौड़ता था तो कभी शिवरीचंदास तक दौड़ता था जो उनकी आदत में सुमार था और हायर सेकंडरी स्कूल लखौरा से राज्य स्तरीय में 800 मीटर दौड़ में शिल्वर मेडल जीतकर और लखौरा स्कूल का नाम रोशन किया।

(4) शासकीय महाविद्यालय पुष्पराजगढ़ ने नेशनल स्तर तक सफर कराया ।

बारहवीं कक्षा पास करने के बाद वे शासकीय महाविद्यालय पुष्पराजगढ़ पहुंचे और कालेज स्टाप का बहुत ही सराहनीय सहयोग मिला खिलाड़ी जीवन में सभी खेलों में महारथ हासिल होने के कारण एक आलराउंडर खिलाड़ी था पुष्पराजगढ़ कालेज के वॉलीबॉल टीम का बेहतरीन खिलाड़ी के रूप में नेतृत्व किया और उत्कृष्ट खेल देखकर चैन कर्ताओं के द्वारा शहडोल जिले का टीम कप्तान बनाया गया जो उनके लिए गौरव का क्षण था ।

उनकी प्रतिभा को और पहचान तब मिली जब उन्होंने चेन्नई में आयोजित नेशनल गेम्स में 42 km मैराथन दौड़ में भाग लेने के लिए गया और 42 km मैराथन दौड़ में चौथा स्थान मिला और वहाँ का अनुभव उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ और चेन्नई मैराथन दौड़ हारने के बाद उन्होंने अपने जीवन को कठिन मेहनत के भठठी में डाल दिया जो संग्राम सिंह धुर्वे आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है छोटे बड़े गरीब अमीर और समाज,अदर समाज के हर व्यक्ति के साथ उनका मधुर संबंध है ।

(5) पुलिस सेवा : नया अध्याय

जिला शहडोल के खेल अधिकारी ने उन्हें पुलिस भर्ती के लिए प्रेरित किया। गरीबी से जूझ रहे संग्राम सिंह के लिए यह सुनहरा अवसर था और भर्ती में सामिल हो गया और उनका चयन पुलिस आरक्षक, जिला सीधी (मध्यप्रदेश) के रूप में हुआ नौकरी मिलने के बाद भी उन्होंने खेलों को नहीं छोड़ा। सीधी पुलिस लाइन से वे रोज़ 25 किलोमीटर दौड़ते हुए चुरहट तक जाते थे और लौटकर पुलिस लाईन आते थे । कभी सोन नदी की रेत में दौड़ के अभ्यास करने के लिए पुलिस लाईन सीधी से पटपरा लालपुर तक दौड़ते हुए जाते थे जो उनकी दिनचर्या थी और जिला सीधी के लिए कई मेडल जीतकर लाए और जिला सीधी का नाम रोशन किया और जबलपुर रेंज का सर्वश्रेष्ट एथलीट बन गए सीधी तैनाती के दौरान ही एक खुंखार डकैत देवी सिंह यादव को दो नग पिस्टल के साथ जिंदा पकड़ने में सफलता हासिल किया था जो उनके जीवन का बहुत बड़ा सफलता था।

सीधी से उमरिया स्थानांतरण के बाद उन्होंने अपनी अभ्यास जारी रखा और मध्यप्रदेश शाजापुर जिले में आयोजित ओपन राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेकर और 400 मीटर, 800 मीटर और 1500 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर मध्यप्रदेश चैम्पियनशिप का अवार्ड अपने नाम किया और उमरिया जिला का नाम रोशन किया और बाद में जिला उमरिया से छत्तीसगढ़ स्थानांतरण के बाद भी अपना अभ्यास चालू रखा और जिला दन्तेवाड़ा तैनाती के बाद बस्तर खेलकूद प्रतियोगिता में कई चैम्पियन शिप अपने नाम किया ।

(6) नक्सल विरोधी अभियान : साहस की अद्वितीय मिसाल

शासन के द्वारा चलाए जा रहे नक्सल विरोधी अभियान जिला दन्तेवाड़ा बस्तर तैनाती के दौरान सबसे बड़ी चुनौती थी जो बस्तर की बोली गोंडी हल्वी का कोई समझ नहीं था छत्तीसगढ़ स्थानांतरण के बाद वे जिला दंतेवाड़ा बस्तर पहुँचे, जहाँ नक्सली हिंसा चरम सीमा पर थी और हर तरफ जवानों की शहादत की खबर आता था जिसको सुनकर रातों की नींद हराम हो जाता था और ऐसे ही खबरों से डर का माहौल बना रहता था संग्राम सिंह धुर्वे अपने माता-पिता का अकेला ही सन्तान है जो एक तरफ माता-पिता का सेवा देखरेख का जवाबदारी था और दूसरे तरफ दुश्मनों से लड़ना था और देश रक्षा का करना था और यही मजबूरी ने संग्राम सिंह को बहादुर बना दिया । संग्राम सिंह धुर्वे माता-पिता का देखरेख भी हो गया और साथ में देश सेवा भी हो गया ।
दो बार घायल होने के बाद भी कभी भी हिम्मत नहीं हारा।
सन 2003 से 2018 तक बस्तर दन्तेवाड़ा तैनाती के दौरान वे लगभग 315 से अधिक पुलिस-नक्सली मुठभेड़ों में शामिल रहे। यह संख्या अपने आप में उनकी बहादुरी का प्रमाण है।

(7) वे दो बार गंभीर रूप से घायल भी हुए –

1. बुरगुम डोरेपारा पुलिस नक्सली मुठभेड़ के दौरान दाहिने हाथ में गोली लगने के बाद भी वे दुश्मनों से डटकर लड़ता रहा।

2. नक्सलियों द्वारा बिछाए गए मूवी ट्रैप में पैर में लोहे का सरिया घुसा और पार हो गया जिससे बुरी तरह घायल हो गए।

(8) इन घटनाओं से उनके हौसले और मजबूत हुआ और नक्सलियों के लिए काल बन गए ।
बस्तर के सभी नक्सली संगठनों के साथ मुठभेड़ हुआ और बस्तर के सभी जिलों में पुलिस नक्सली मुठभेड़ में सामिल हुआ छत्तीसगढ़ वार्डर आंध्रप्रदेश, मलकानगिरी, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश में पुलिस नक्सली मुठभेड़ में सामिल रहा।

कई बार संग्राम सिंह को मेडिकल उपचार व मेडीसन दवा गोली की जानकारी होने के कारण जवानों को गोली लगने से व नक्सलियों द्वारा लगाए गए प्रेसर बम व मूवीटेरेप में घायल होने से जंगल में सबसे पहले उपचार करके कई जवानों की जान बचाया है ।

(9) असाधारण प्रमोशन : कार्यकुशलता की पहचान
*
छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी बहादुरी और उत्कृष्ट सेवा को मान्यता देते हुए मात्र दो साल में चार प्रमोशन देकर उन्हें आरक्षक से निरीक्षक तक पहुँचा दिया। यह उपलब्धि पुलिस विभाग के इतिहास में दुर्लभ है और आज तक हिन्दुस्तान के इतिहास में इतना जल्दी किसी को प्रमोशन नहीं मिला ये उनकी लगन कठिन मेहनत और कार्यकुशलता का उदाहरण है।

(10) सम्मान और पुरस्कार : गौरव के क्षण*

उनकी वीरता और उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें कई बार सम्मानित किया गया। प्रमुख सम्मान –

1. 2009 – नक्सल विरोधी अभियान में उत्कृष्ट कार्य, दंतेवाड़ा

2. 2016 – स्वतंत्रता दिवस समारोह विभाग में उत्कृष्ट कार्य करने, दंतेवाड़ा

3. 2017 – गणतंत्र दिवस सम्मान पुलिस विभाग में उत्कृष्ट कार्य करने दंतेवाड़ा

4. 2019 –नक्सल विरोधी अभियान में उत्कृष्ट कार्य करने पर ( राष्ट्रीय वीरता ) पदक से सम्मानित ।

5. 2020 – नक्सल विरोधी अभियान में उत्कृष्ट कार्य करने पर जिला कबीरधाम में सम्मानित।

6. 2021 – कोरोना वारियर्स सम्मान से सम्मानित जिला दुर्ग

7. 2021 – राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह यातायात उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित जिला दुर्ग

8. 2022 – गणतंत्र दिवस में उत्कृष्ट कार्य करने पर सम्मानित जिला दुर्ग

9. 2025 – हत्या के प्रकरणों में उत्कृष्ट विवेचना के लिए सम्मानित जिला कबीरधाम

 

(11,)परिवारिक जीवन और खेलों में: नई प्रेरणा*

परिवार जीवन में जब श्रीमती शर्मिला सिंह धुर्वे के रुप में एक जीवन साथी थी मिली तब से संग्राम सिंह धुर्वे और कठिन मेहनत करने लगा शर्मिला सिंह धुर्वे शिक्षिका हैं और शादी से पहले विद्यार्थी जीवन में खेलों से कोई रिश्ता नहीं था पर संग्राम सिंह धुर्वे का कठिन मेहनत से प्रेरित होकर और खुद 36 साल उम्र के बाद अभ्यास चालू करी और श्रीमती शर्मिला सिंह धुर्वे स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है और स्कूल से आने के बाद और स्कूल जाने से पहले कठिन मेहनत करती है और अपने घर की सारी काम करने के बाद भी अपने अभ्यास के लिए समय निकालकर और अभ्यास करती है शर्मिला सिंह ने राष्ट्रीय मास्टर खेलों में भाग लेकर और गोल्ड मेडल और सिल्वर मेडल जीतकर और क्षेत्र का और शिक्षा विभाग का नाम रोशन की है और राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बन गई और कई मेडल अपने नाम की है।
पत्नी श्रीमती शर्मिला सिंह धुर्वे उनकी सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति बन गई है हमेशा अभ्यास में सहयोग करती है और एक शिक्षिका होते हुए भी कभी मेहनत से हार नहीं मानती और दोनों पति-पत्नी एक दोस्त की तरह मिलकर अभ्यास करते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं।

वहीं बेटा हर्षित सिंह धुर्वे और
बेटी प्रार्ची सिंह धुर्वे भी अपने पापा का अभ्यास में कठिन मेहनत करते हैं । ये चारों ग्राउंड में मिलकर अभ्यास करते हैं
संग्राम सिंह स्वयं कई बार राष्ट्रीय स्तर के खेलों में भाग लेकर कई मेडल जीत चुके हैं और एक बार अंतर्राष्ट्रीय मास्टर खेल प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व कर दो स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीतकर अपने क्षेत्र जिला संभाग राज्य और भारत देश नाम रोशन किया जो हमारे क्षेत्र के लिए गौरव की बात है।

–(12)संगीत और लोककला : सर्व समाज से लगाओ
*
पुलिस और खेल सेवा के साथ-साथ वे संगीत और संस्कृति से भी जुड़े रहते हैं वे हिंदी, छत्तीसगढ़ी लोकगीत, जस गीत, भजन, देशभक्ति गीत और आदिवासी पारंपरिक गीतों के गायक, लेखक और संगीतकार भी हैं।
उनका अपना YouTube चैनल – ( MP MUSIC KHETGAON ,) है, जहाँ उनके गीत और संगीत को लोग सुनते और सराहते हैं। गीत संगीत के माध्यम से वे समाज और संस्कृति को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं।

-(13,) आग और पानी से लड़कर लोगों का जान बचाया।

संग्राम सिंह धुर्वे मां नर्मदा मैया के किनार में पैदा होने के कारण गर्मी के दिनों में नर्मदा नदी में ही ज्यादा तैरने और पानी में खेलने गुजरता था और तैरने में बचपन से ही महीर था जो बस्तर तैनाती के दौरान उफनती नदी नालों कई बार‌ बाढ़ में डूबने वालों का जान बचाया है और जहां गोताखोर लोग हार जाते थे वहां कई मृत शव निकाल कर और परिजनों का सहयोग किया है जिसके लिए दन्तेवाड़ा पुलिस अधीक्षक के द्वारा सम्मानित भी किया गया है।
थाना तरेगांव जंगल पद स्थापना के दौरान एक जलते हुए आदमी के ऊपर लपटकर और अपने जान परवाह किए बिना जलते हुए आदमी का कपड़ा को अपने दांत से काट कर और कपड़ा फाड़कर फेंका और जलते हुए आदमी का जान बचाया जो आज तक के इतिहास में किसी ने नहीं किया है संग्राम सिंह धुर्वे हमेशा इतिहास बनाने का काम किया है।

( 14) सामाजिक सेवा में महान योगदान और जनसंपर्क ।

पुलिस अधिकारी और खिलाड़ी होने के साथ-साथ वे एक सच्चे जनसेवक भी हैं। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों से उनके गहरे संबंध हैं। वे हमेशा समाज की समस्याओं को सुलझाने और जनता की मदद करने के लिए तत्पर रहते हैं। सर्व समाज के युवा भाई बहनों को अच्छा पढ़ाई और अच्छा खेल कूद के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं पुलिस, सेना, अग्निवीर, फौज,रेलवे, फारेस्ट आदि भर्ती के लिए कैसे अभ्यास करें सब लोगों समझाते हैं।

(15) निष्कर्ष : संघर्ष से सफलता तक की प्रेरणादायक पल
*
संग्राम सिंह धुर्वे की कहानी संघर्ष, साहस और सफलता की अद्भुत मिसाल है। एक गरीब मजदूर परिवार का बच्चा, जिसने बचपन से ही कठिनाइयों का सामना किया वो आज पुलिस सेवा में उच्च पद पर है, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी है, राष्ट्रीय वीरता से सम्मानित है गायक-संगीतकार, गीतकार है और समाजसेवक भी है । जो हर किसी के दिल में राज करता है ।

उनकी जीवनी गाथा हमें यह सिखाती है कि –
👉 गरीबी और अभाव कभी भी इंसान की प्रतिभा को छुपा नहीं सकता है ।
👉 कठिनाइयाँ ही हमें जीतना सिखाता है और इरादा मजबूत बनाती हैं।
👉 सच्ची लगन और ईमानदारी से मेहनत करने पर कोई भी मंजिल पा सकता है।

संग्राम सिंह धुर्वे दो बार घायल होकर देश के लिए खून बहाकर अपनी वीरता दिखाया और पसीना बहाकर नेशनल इंटरनेशनल में मेडल जीतकर साबित कर दिया की कठिन मेहनत से जो चाहो जीत सकते हो ।

आज वे युवाओं के लिए प्रेरणा हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्रमाण हैं कि “संघर्ष से ही हर सफलता का मार्ग निकलता है।”
संघर्ष करने वाले कभी हार नहीं सकते,असफल नहीं हो हकते हैं ये सत्य है संग्राम सिंह धुर्वे ने ये करके दुनिया को दिखाया मजदूरी करके पढ़ाई किया और अपने मेहनत से आरक्षक से इन्स्पेक्टर बना ये संघर्ष की कहानी है ।

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