रेवांचल टाईम्स – एक समय की बात है चम्पक नगर में वेखानस नामक राजा रहते थे। एक दिन राजा ने सपने में अपने पितरों को नीच योनि में पड़ा हुआ देखा । उन सबको इस अवस्था में देखकर राजा के मन में बड़ा विस्मय हुआ। प्रातःकाल ब्राह्मणों से उन्होंने सपने का सारा हाल कह सुनाया। राजा बोले- मैंने अपने पितरोंको नरक में गिरा देखा है। वे कह रहे थे कि तुम हमारे तनुज हो, इसलिए इस नरक से हमारा उद्धार करो ।’ मेरा हृदय रुंधा जा रहा है। कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरे पूर्वज तत्काल नरकसे छुटकारा मिल जाए। ब्राह्मण बोले–राजन् यहां से निकट ही पर्वत मुनि का महान् आश्रम है। वे भूत ओर भविष्य के भी ज्ञाता हैं। आप उन्हीं के पास चले जाइए। राजा मुनि के पास गए और प्रणाम कर सब कुछ बताया।
राजा बोले-स्वामिन! आपकी कृपासे मेरे राज्य सकुशल हैं। लेकिन मेंने सपने में देखा है कि मेरे पितर नरक में पड़े हैं; अतः बताइए किस पुण्य के प्रभावसे उनका उनका छुटकारा होगा। राजा की यह बात सुनकर मुनि राजासे बोले-महाराज ! मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में जो मोक्षदा नामकी एकादशी होती है, तुम सब लोग उसका व्रत करो और उसका पुण्य पितरों को दे डालो । उस पुण्यके प्रभाव से उनका नरक से उद्धार हो जाएगा ।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-युधिष्ठिर इस प्रकार राजा मुनि की बात सुनकर अपने घर लौट आये | जब मार्गशीर्ष मास आया, तब राजा ने मुनि के कहे के अनुसार मोक्षदा एकादशीका व्रत किया। उसका पुण्यअपने पितरों सहित पिता को दे दिया। वैखानस के पिता पितरों को सहित नरक से छुटकारा मिल गया और वो बोले-तुम्हारा कल्याण हो। यह कहकर वे स्वर्ग में चले गए। इसलिए जो मोक्षदा एकादशीका व्रत करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और मरने के बाद वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। ऐसा कहा जाता है कि जो इस व्रत कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है।
पं मुकेश जोशी9425947692