रज़ा उत्सव में सजी साहित्य की महफ़िल ‘समवाय’ में कवियों ने किया अपनी रचनाओं का पाठ

रेवाँचल टाईम्स – मंडला सोमवार को माँ नर्मदा किनारे पावन महिका मंडला में रज़ा फाउंडेशन के तत्वाधान में रज़ा साहब की स्मृति में पाँच दिवसीय कार्यक्रम के तीसरे दिन झंकार भवन में ‘समवाय’ कविताओं, आलाप और ‘कविता का अरण्य’ की एक सुंदर और समृद्ध वार्तालाप और चर्चा से दिन समृद्ध हुआ। कार्यक्रम की शुरूआत अशोक वाजपेयी ने रज़ा साहब की सुंदर स्मृतियों को दर्ज करते हुए मण्डला से भी जुड़ी उनकी स्मृतियों को साझा करते हुए किया। साथ ही अरूण कमल, तेजी ग्रोवर, आशुतोष दुबे, रश्मि भारद्वाज, सुशीला पुरी, संगीता गुंदेचा, पवन करण, व्योमेश शुक्ल और सत्यव्रत रजक ने कविता पाठ किया। कविता पाठ में अरूण कमल जी की पंक्तियों ‘कह नहीं सकता वहाँ क्या पक रहा था चुपचाप, निर्धूम आँच पर, वैसे भी वर्जित है रसोई में प्रवेश” ने रसोई से जुड़ी एक सुंदर आस्था को दृश्य में बहुत सुंदर स्थान दिया।

संगीता गुंदेचा ने ‘हँसी’ कविता का पाठ करते हुए वाणी को नमस्कार कहा। तेजी ग्रोवर की पंक्तियां “मैं पीठ करके सोई थी, कितना ख़फ़ीक था उनका कुतरना मेरी पीठ को” कविता में हमारी विश्वसनीयता को बचाकर रखता है, हमारी साहसिकता को बचाकर रखता है। आशुतोष दुबे की पंक्तियां ‘आदमी रो सकता, तो अपनी मौत पर सबसे ज़्यादा रोता’ हमें हमारी जड़, ज़मीन और अस्तित्व से बांधे रखती है। रश्मि भारद्वाज की कविता की पंक्तियों “एक मैं हूँ बुलायी गयी इतने नामों से, उनकी बुनी कथाओं में, स्वयं को पुकारना चाहती हूँ” में हमें स्त्री मन के सबसे सुंदरतम रूप की एक झलक दिखती है, करूणा और एक आलाप भी सुनाई देता है। कविता में स्वायत्तता और स्वतंत्रता दिखती है। इसी प्रकार सुशीला पुरी की कविता की पंक्तियां ‘केन का उद्गम देखने, गए थे कवि केशव’ ने सोनभद्र की कलकल को, प्रकृति के महत्व को उजागर किया।

ठीक इसी प्रकार पवन करण ने फूलवती कविता की पंक्तियों ‘बाबूजी, पिछले साल की तरह, इस साल भी चुपके से आपने घर में रखा पुराना मटका क्यो नहीं तोड़ा?” हमें अपने बचपन के दिनों में ले जाती हैं। व्योमेश शुक्ल की पंक्तियों, “सोचता हूँ दियासलाई का थोक कारोबार शुरू कर दूँ, बैठे-बैठे किराया खाने से तो बेहतर होगा यह आग लगाना इतना ज़रूरी काम है कि धंधा कभी मंदा हो ही नहीं सकता” की व्यंग्यात्मक शैली ने सबको प्रफुल्लित किया। इस प्रकार कविता पाठ के बाद ‘कविता का अरण्य’ चर्चा से कविताओं का वह पक्ष सामने जिसपर हमें विचार करने की अत्यंत आवश्यकता है।

अरण्य किस प्रकार से कविताओं के भीतर काम करता है, किस प्रकार से आगे इसमें कार्य किया जा सकता है, यह किस प्रकार एक संत्रास के रूप में या सकारात्मक रूप में हमारे सामने आता है, इन सभी पहलुओं पर चर्चा की गयी। ज्योतिष जोशी ने कहा कि, “कलाकार किस प्रकार कला सृष्टि करता है, परोक्ष के सिद्धांत के साथ कलाकार को कृति में स्वयं को विसर्जित करना पड़ता है।” विनोद तिवारी के अनुसार साहित्य एक ओपन टेक्स्ट है और उन्होंने उपनिवेशवाद, बाज़ारवाद, धार्मिकतावाद के आच्छादन का पक्ष रखा। प्रभात रंजन ने प्रकृति से जुड़ी अमृत रंजन और जसिंता करकेट्टा की कविताएँ पढ़ते हुए अरण्य के महत्व को बताया। अरूण होता ने कहा कि अरण्य में रहस्य है, रोमांच है, उसी पथ के हम राही हैं। यह अरण्य ही है जिसे कवि सुंदरता से रेखांकित करता है। ‘हम अपना समय लिख नहीं पायेंगे’ अशोक वाजपेयी जी की इस कविता को अरूण होता ने उद्धृत की।

अजित कुमार राय ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि, “कविता अंतिम ज्योति के रूप में बचती है।” इस चर्चा के अंतिम वक्ता व्योमेश शुक्ल ने एकांत शब्द को उजागर करते हुए एकांत और अरण्य की कड़ी में ‘ध्वनि माधुरी’ को ‘श्रुति सुखदाता’ के शब्दों के बारे में बताया, आगे यह बताया कि हम अपनी समाजधर्मिता से विमुख नहीं हो सकते। इस चर्चा से कार्यक्रम का समापन हुआ। 22 जुलाई 2025, दिन मंगलवार की सुबहः 11:00 बजे से झंकार सभागार में आयोजित काव्य पाठ में कवि सुंदर चंद ठाकुर, पराग पावन, शैलेय, जोशना बैनर्जी आडवानी, बाबुषा कोहली, पूनम अरोड़ा, अजित कुमार राय शिरकत करेंगे।

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