एकादशी व्रत कथा मंगल वार, पं मुकेश जोशी
रेवांचल टाईम्स – श्रवण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। इस दिन संतान संबंदी समस्याएं दूर होती हैं और व्यक्ति के सभा पा कट जाते हैं। इस साल पुत्रदा एकादशी मंगल वार को रखी जाएगी। इस व्रत में महिष्मति नगर के राजा महिजीत से जुड़ी कथा पढ़ी जाती है। कैसे मुनि लोमेश ने उसे कष्टों से छुटाकारा दिलाने के लिए उपाय बताया
द्वापर युग में राजा महिजीत का महिष्मति नगर पर शासन था। वह बहुत उसे राजपाट में कोई रूचि नहीं थी, क्योंकि उसे कोई पुत्र नहीं था। उसे राज्य सुखकारी नहीं लगता था। पुत्र प्राप्ति के लिए उसने दान-पुण्य और यज्ञ, हवन किए, लेकिव राजा महीजित का मनना था कि अगर पुत्र न हो तो पृथ्वी और स्वर्ग दोनों ही लोक कष्टकारी होता है। राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए कई उपाय किए, लेकिन सफलता नहीं मिली। इससे वह और भी दुखी हो गया। वृद्धावस्था आती हुई देखर राजा अपनी प्रजा और विद्धानों को बुलाकर कहने लगा कि मैनें इस जन्म में तो कोई पाप नहीं किया है, मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है। इसके अलावा मैनें देव मंदिरों ग्रहस्थों और ब्राह्मणों का धन भी नहीं छीना है। मैं प्रजा का पुत्र के समान पालन करता हूं और सन्यासियों को भी भरपूर दान करता हूं। न्याय की रक्षा के लिए मैं अपराधियों को दंड देता हूं। सज्जनों की सदा पूजा करता हूं। इस प्रकार धर्म युक्त राज्य करता हूं, लेकिन फिर भी मेरा कोई पुत्र नहीं है। उसके कारण मैं दुख पा रहा हूं।
राजा की इस समस्या के निवारण के लिएमंत्री वन में ऋषियों और मुनियों की तलाश में लग गए। एक आश्रम में उन्हें एक तपस्वी मिलें, जो धर्म के ज्ञाता थे और परमात्मा में मन लगाए हुए थे। उनका नाम लोमेश मुनि था। एक कल्प के व्यतीत हो जाने पर एक रोम गिरता है, लोमेश मुनि की उतनी आयु थी। मंत्रियों मे लोमेश मुनि को प्रणाम किया और उन्हें राजा के बारे में बताया। मंत्रियों ने मुनि से कहा कि हमें भरोसा है कि आपके दर्शन से हमारा संकट जरूर दूर होगा। आप कृपा कर राजा को पुत्र होने का उपाय बताएं। यह सुनकर लोमेश मुनि ने आंखे बंद की और राजा के पिछले जन्म का सारा वृतांत जान लिया। तब मुनि ने बताया कि आपका राजा पिछले जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण उसने बहुत बुरे कर्म किए। वह एक गांव से दूसरे गांव व्यापार करने जाता था। एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की एकादसी ते जिव वह दो दिन से भूखा था, एक जलाशय पर पानी पीने गया । उस स्थान पर गाय जल पी रही थी। उसने गायों को जल पीने से हटा दिया और खुद जल पीने लगा। इस पाप के कारण राजा निंसंतान रह गया। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा बना और प्यासी गायों को जल पीने से हटाने के कारण पुत्रहीन बनकर दुख भोग रहा है।
वही मंत्रीगणों ने कहा, हे मुनि आप वो उपाय बताएं, जिससे राजा का यह पाप नष्ट हो और उन्हें पुत्र मिलें। लोमेश मुनि ने उत्तर दिया कि श्रवण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं, इस दिन व्रत करें और रात में जागरण करें। अवश्य ही राजा को पुत्र की प्राप्ति होगी। मुनि की बातों को राजा ने सुना और एकादशी व्रत और जागरण किया। इसके बाद द्वादशी को इसके पुण्य का फल मिलेगा और रानी गर्भवती हो गई और उसके गर्भ से एक तेजस्वी पुत्र पैदा हुआ। इसलिए श्रावण मास की इस एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। संतान सुख की कामना करने वाले लोगों को इस व्रत को करना चाहिए, इससे सब पाप छूट जाते हैं और व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है*पं
मुकेश जोशी 9425947692