शिक्षा का डिजिटल स्वरूप : अवसर या चुनौती
रेवांचल टाईम्स -मंडला, शिक्षा का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा है और आज इसका सबसे आधुनिक रूप डिजिटल शिक्षा है। स्मार्टफोन, इंटरनेट और विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स ने ज्ञान को हर किसी तक पहुँचाना सरल बना दिया है। लेकिन इस सुविधा के साथ कई गंभीर चिंताएँ भी जुड़ी हुई हैं। आज के विद्यार्थी पारंपरिक शिक्षकों की बजाय डिजिटल साधनों पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। इससे उन्हें जानकारी तो मिल जाती है, परंतु सही और गलत का अंतर समझने की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
डिजिटल शिक्षा का अंधाधुंध उपयोग विद्यार्थियों की सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर कर रहा है। वे अब दिमाग पर जोर देने के बजाय केवल स्क्रीन पर उपलब्ध उत्तरों पर भरोसा करने लगे हैं। गूगल और चैटजीपीटी जैसे साधनों पर निर्भरता के कारण बच्चे मानसिक रूप से पंगु होते जा रहे हैं। यह स्थिति सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी खतरनाक है।
शिक्षकों का दायित्व है कि वे विद्यार्थियों को समय-समय पर नैतिक शिक्षा दें और पढ़ने-लिखने की आदत विकसित करें। क्योंकि देखना और सुनना केवल कुछ समय तक याद रहता है, लेकिन पढ़ना और लिखना आजीवन ज्ञान को स्थायी बनाता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि एक अच्छे नागरिक का निर्माण करना है।
इसलिए आवश्यक है कि डिजिटल शिक्षा की सीमाएँ तय की जाएँ। इसका उपयोग केवल एक सहायक साधन के रूप में होना चाहिए, न कि पूरी तरह उस पर निर्भरता बनाई जाए। शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर संतुलित शिक्षा पद्धति अपनाएँगे तो ही समाज का सही भविष्य गढ़ा जा सकेगा।
— मीतेश तिवारी “मृदुल”