लोक निर्माण विभाग का ये कैसा विकास जहाँ काम कम जाँच अधिक….

मवई–कुड़ेला सड़क : भ्रष्टाचार की जीवित प्रयोगशाला

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दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला, आदिवासी बाहुल्य जिले में सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार ग़बन लूट ये आम बात हो चली है और ये एक परंपरा बन चुकी है जहाँ बाबू से लेकर जिम्मेदार अधिकारी ब ख़ूबी निभाते नजर आ रहे है और आदिवासी जनता का विकास हो या नही पर विकास का ढिंढोरा पीटने वालो का विकास तो दिन दुगना रात चुगना हो रही हैं इसी विकास के आज जबलपुर की लोकायुक्त और आर्थिक अपराध जैसी जांच ऐजेन्सी इस जिले के जिम्मेदारो पर निगाहे बनाई हुई है वावजूद इसके लूट का कारोबार बेखौफ जारी है

वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार लोक निर्माण विभाग मंडला के द्वारा मवई जनपद पंचायत के अंतर्गत मवई से कुड़ेला तक बन रही सड़क इस घोटाले की सबसे शर्मनाक मिसाल बन चुकी है। करोड़ों की लागत से बन रही यह सड़क अभी पूरी भी नहीं हुई और गुणवत्ता का ख्याल नही रखा जा जहाँ सड़क कम बन रही है मंडला जबलपुर और भोपाल के अधिकारियों के द्वारा गुपचुप तरीके से जाँच महीने में चार बार करते नजर आ रहे है। और मीडिया को देख भाग खड़े हो जाते है ये किस जाँच और मानक मटेरियल बनी सड़क कमजोर बेस, गलत लेयरिंग और मानकों से खिलवाड़ साफ-साफ दिखाई दे रहा है।
स्थानीय स्तर पर बार-बार शिकायतें की गईं—
न गुणवत्ता की जांच,
न तकनीकी मानकों का पालन।
जब शिकायतें दबाव बनकर ऊपर तक पहुंचीं, तब जाकर मजबूरी में उच्चस्तरीय जांच टीम गठित की गई। जांच के दौरान सड़क के कई हिस्सों में गंभीर खामियां पाई गईं, हालात इतने खराब थे कि टीम को कुछ हिस्से तोड़ने तक के निर्देश देने पड़े।
सवाल सीधा है—
अगर सड़क इतनी खराब थी, तो निर्माण के दौरान जिम्मेदार अधिकारी क्या सो रहे थे?
या फिर सब कुछ देखकर भी आंखें मूंदे बैठे थे?
जांच या दिखावा? मीडिया से छिपकर चल रहा खेल
मंडला में यह पहला मामला नहीं है। यहां जांच दल आते हैं तो चुपचाप, जांच करते हैं चुपचाप, और लौट जाते हैं चुपचाप।
न मीडिया को सूचना, न मौके पर पहुंचने की अनुमति, न रिपोर्ट सार्वजनिक।
आरोप गंभीर हैं—
जांच के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई जाती है और बाद में अंदरखाने समझौता हो जाता है। न दोषियों के नाम सामने आते हैं, न कार्रवाई दिखाई देती है।
मुख्य अभियंता आर.एल. वर्मा का
‘गोपनीय मिशन’
शनिवार को जबलपुर संभाग से मुख्य अभियंता आर.एल. वर्मा मंडला पहुंचे। साथ में जांच दल और पीडब्ल्यूडी की केंद्रीय परीक्षण प्रयोगशाला का वाहन भी मौजूद था। दावा किया गया कि जहां संदेह होता है, वहां से सैंपल लिए जाते हैं।
लेकिन सवालों की लंबी कतार खड़ी है—
किस सड़क से सैंपल लिए गए?
कितने सैंपल लिए गए?
जांच में क्या पाया गया?
इनमें से एक भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।
अगर जांच ईमानदार है, तो उसे छिपाया क्यों जा रहा है?
सर्किट हाउस बना ‘दरबार’
मुख्य अभियंता का मंडला प्रवास निरीक्षण से ज्यादा मेहमाननवाजी का दृश्य पेश करता नजर आया। सर्किट हाउस में कार्यपालन यंत्री, एसडीओ और उपयंत्री साहब की सेवा में लगे दिखे खाने-पीने से लेकर आवभगत तक हर इंतजाम।
माहौल ऐसा मानो निरीक्षण नहीं बल्कि “साहब को खुश रखने” का कार्यक्रम चल रहा हो
हर कोशिश यही कि सवाल न हों, नाराजगी न हो और जांच ज्यादा गहराई में न जाए।
मीडिया के सवालों से बचते दिखे मुख्य अभियंता
जब मीडिया ने मवई–कुड़ेला सड़क में भ्रष्टाचार पर सीधा सवाल किया तो जवाब मिला—
“हम रूटीन जांच पर आए हैं।”
किस सड़क की जांच?
गोल जवाब।कहां-कहां सैंपल लिए गए?
चुप्पी। मंडला–जबलपुर सड़क से सैंपल?
“हमें नहीं पता।”
यह जवाब नहीं, जवाबदेही से खुला पलायन था।
जनता पूछ रही है जांच किसके लिए?
मंडला की जनता आज सीधे सवाल पूछ रही है—
अगर जांच में भ्रष्टाचार मिलता है तो कार्रवाई क्यों नहीं होती?
अगर कार्रवाई होती है तो वह सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
हर साल करोड़ों खर्च होते हैं,
और हर दो-तीन साल में सड़कें उखड़ जाती हैं।
बरसात में गड्ढे मौत का न्योता बनते हैं,
लेकिन जिम्मेदार बेफिक्र रहते हैं।
भ्रष्टाचार का पूरा मॉडल उजागर
मंडला में सड़क निर्माण अब विकास नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक करप्शन मॉडल बन चुका है—
राजधानी में टेंडर, जिले में मिलीभगत,
घटिया निर्माण, दिखावटी जांच
और अंत में फाइल बंद। अब जवाब चाहिए, चुप्पी नहीं यह सिर्फ एक सड़क की कहानी नहीं, यह पूरे सिस्टम का पोस्टमार्टम है।
जब तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होगी
दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी
तब तक यह खेल चलता रहेगा।
मंडला की जनता अब चुप नहीं है।
उसे खुली, निष्पक्ष और सार्वजनिक जांच चाहिए।
वरना यह मान लिया जाएगा कि
सड़कों की तरह सिस्टम भी पूरी तरह खोखला हो चुका है। जनता को दिखावे और लूटने के लिए बनाई जा रही है सड़कें लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों की भूमिकाएं संदिग्ध नजर आ रही हैं

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