रिश्तेदारी की आड़ में सरकारी लूट!

ग्राम पंचायत पलेहरा में फर्जी बिलों से लाखों की हेराफेरी, सरपंच-रिश्तेदारों की साठगांठ उजागर

जनकल्याण योजनाओं में खुला खेल फरजीवाड़े का

सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक और उपयंत्री बना ‘लूट का गठबंधन’

रेवांचल टाइम्स मंडला जिले की आदिवासी बहुल ग्राम पंचायतों में सरकार की योजनाएं भ्रष्ट तंत्र के पेट भरने का साधन बन चुकी हैं। ग्राम पंचायत पलेहरा इसका ताज़ा और शर्मनाक उदाहरण है।
सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक और उपयंत्री — मिलकर सरकारी योजनाओं के नाम पर जनता का हक हड़प रहे हैं।
फर्जी बिलों का खेल — कागज़ों पर लाखों की लूट

धुंधले बिल, बिना बैठक, बिना प्रस्ताव — पैसा सीधा अपनों की जेब में

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक जनपद पंचायत मोहगांव की ग्राम पंचायत पलेहरा में लाखो की सरकारी योजनाओं की राशि का दुरुपयोग किया गया। पंचायत दर्पण पोर्टल में दर्ज निम्न बिलों से घोटाले की परतें खुलती हैं:
7 मार्च 2025:
बिल क्रमांक 146 — ₹1,28,000
उसी दिन — ₹1,92,000 (शिव कुमार वरकड़े को भुगतान)
23 अक्टूबर 2024:
पत्तल का रेट ₹15 × 40 = ₹600
बिल में दर्शाया गया — ₹6,000
20 दिसंबर 2024:
शिव कुमार को ₹18,000
1 अप्रैल 2025:
शैल कुमार पंचेश्वर, धुंधला बिल — फिर भी भुगतान
5 मई 2025:
“सल्लू टूर एंड ऑटो पार्ट्स” बिलगांव — ₹19,100 (वाहन किराया)
23 अक्टूबर 2024:
“शिवा किराना एवं स्टेशनरी” — ₹73,000
(दाल, चावल, स्टेशनरी, मास्क, सेनेटाइज़र जैसी सामग्री के नाम पर)

रिश्तेदारी बनी भ्रष्टाचार की ढाल

सरपंच के रिश्तेदार को ठेकेदार बनाकर की गई जमकर बंदरबांट

गांव के लोगों ने बड़ा खुलासा किया है — शिव कुमार वरकड़े, जिनके नाम से कई बिलों का भुगतान हुआ है, सरपंच का रिश्तेदार है और कंचनगांव का निवासी है।
“शिवा किराना एवं स्टेशनरी” नाम की कोई दुकान मोहगांव में मौजूद ही नहीं है — इसके बावजूद फर्जी खरीदी दिखाकर ₹73,000 का भुगतान कर दिया गया।
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा

“विकास सिर्फ फाइलों में, हकीकत में शून्य” — पंचायत नागरिकों का आरोप

गांव के जागरूक नागरिकों ने इस घोटाले के खिलाफ आवाज़ उठाई है। उनका कहना है:

अगर सरकारी धन ऐसे ही रिश्वत और रिश्तेदारी में बहता रहा, तो असली हकदारों तक कोई सुविधा नहीं पहुंचेगी।”
* जिम्मेदार बोले: ‘हमें कुछ नहीं पता’

एक और घोटाले में वही घिसा-पिटा बहाना — जांच चल रही है!

संदीप खंडपुरे, उपयंत्री, मोहगांव:

मैं नया हूँ, ज्यादा जानकारी नहीं है। कमेटी गठित कर दी गई है, जांच चल रही है।”
महेंद्र भांवरे, रोजगार सहायक:
“जिन बिलों का भुगतान हुआ, वे बिना प्रस्ताव और बिना ग्राम सभा की जानकारी के हुए हैं। पंचों को कोई सूचना नहीं थी।”

मुख्य कार्यपालन अधिकारी से बात की गई तो जवाब मिला:
मैं मीटिंग में हूँ, बाद में बात करूँगा।”

सवालों के घेरे में पंचायत तंत्र
क्या रिश्ता भ्रष्टाचार को बचाने की गारंटी बन गया है?
पंचायतों में क्या हर जांच का मतलब है — वसूली और लीपापोती?
कब तक फर्जी बिलों के दम पर गरीब आदिवासियों का हक छीना जाएगा?
सरकारी योजनाओं की लूट में ‘रिश्तेदारी सिंडिकेट’ सक्रिय — कार्रवाई कब होगी?

ग्राम पंचायत पलेहरा का यह मामला सिर्फ एक गांव का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की नाकामी और सड़ांध का प्रतीक बन चुका है। सवाल अब सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं है, बल्कि उस सोच का है जो गरीबों की रोटी पर भी रिश्तेदारी की छाया डालकर उसे निगल जाती है।

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