37 हज़ार करोड़ का बजट फिर भी बच्चे सेब-दूध को तरसें? केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बयान ने MP में खोला सियासी घोटाले का पिटारा!

कांग्रेस ने पूछा सरकार से : ‘अगर बच्चों को पोषण नहीं मिला, तो बजट किसने खाया?’

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रेवांचल टाइम्स  – भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में सोमवार को वह विस्फोट हो गया जिसकी भनक किसी को नहीं थी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति विषयक सम्मेलन में भोपाल आए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के एक बयान ने प्रदेश की राजनीतिक जमीन को झकझोर कर रख दिया। मंत्री जी ने मंच से कहा

“मध्यप्रदेश में डेढ़ करोड़ छात्रों में से लगभग 50 लाख बच्चों ने 5वीं तक सेब देखा तक नहीं है। कई बच्चों को जब एक गिलास दूध चाहिए होता है… तब भी नहीं मिलता।”

 

प्रधान का यह बयान यूं तो “पोषण और समाज की जिम्मेदारी” पर था, लेकिन इसमें छिपा संकेत सीधे-सीधे सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत और बजट के वास्तविक असर पर सवाल खड़ा करता है, और इसी ने आग की चिंगारी को ज्वालामुखी में बदल दिया।

 

कांग्रेस ने इस मामले को लपका और केंद्रीय मंत्री के बयान को हथियार बनाते हुए राज्य सरकार पर पलटवार किया “धन्यवाद प्रधान जी, आपने असली चेहरा दिखाया”

 

केंद्रीय मंत्री के बयान के बाद शिविर बदलने वाली सबसे जोरदार आवाज उठी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की ओर से। उन्होंने X पर पोस्ट करते हुए लिखा

“बहुत-बहुत धन्यवाद प्रिय धर्मेंद्र प्रधान जी, आपने 25 साल पुरानी BJP सरकार का असली चेहरा पूरे देश और मध्य प्रदेश की जनता के सामने ला दिया।”

 

पटवारी ने आंकड़ों के साथ तीर चलाते हुए सरकार से पूछा;

7 साल पहले MP में 1 करोड़ 60 लाख विद्यार्थी थे।

यह संख्या घटकर अब 1 करोड़ 04 लाख रह गई है।

यानी 50 लाख बच्चे ‘गायब’ हो गए।

इसी अवधि में शिक्षा-पोषण बजट 7 हज़ार करोड़ से बढ़कर 37 हज़ार करोड़ हो गया।

पटवारी का आरोप बेधड़क था

“इतना बड़ा बजट हो गया, लेकिन बच्चे आज भी सेब-अंजीर नहीं खा पा रहे, दूध नहीं मिल रहा तो इसे कौन ‘खा’ रहा है?”

उन्होंने आगे कहा; जब हम तर्क और तथ्य के साथ सवाल पूछते हैं, तो सरकार का अहंकार जवाब देने से भाग जाता है। आज आपके ही केंद्रीय मंत्री ने आपको आईना दिखा दिया है, यह चेहरा अब जनता भी देख रही है।”

 

‘स्कूली पोषण’ पर फोकस या सरकारी भ्रष्टाचार पर संकट?

 

धर्मेंद्र प्रधान का यह बयान सिर्फ प्रशासनिक कमियों पर चिंता नहीं बल्कि उस बजट, विज़न और क्रियान्वयन मॉडल पर सीधा प्रश्न है, जिस पर मध्यप्रदेश सालों से दावा करता आया है। सवाल यह भी है कि;

बजट बढ़ा तो था

पर बच्चों की पोषण-स्थिति सुधरी क्यों नहीं?

विद्यार्थी संख्या घटी, इसके कारण क्या है?

क्या स्कूल छोड़ना बढ़ा? या रिकॉर्ड-मैनेजमेंट में गड़बड़ी है?

 

कांग्रेस इसे पोषण योजनाओं में भ्रष्टाचार के सिस्टमेटिक संकेत के तौर पर पेश कर रही है

“बजट बढ़ा पर बच्चों को लाभ नहीं मिला मतलब बीच में खाया कहीं और गया।”

 

सियासत की नई दिशा, ‘पोषण बनाम प्रचार’

 

बीजेपी के लिए मुश्किल यही है कि ये आरोप विपक्ष से नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के ही मंत्री के बयान से शुरू हुए। सत्ता-दल के लिए यह दोधारी तलवार है

यदि वे मंत्री की बात सही मानते हैं, तो राज्य सरकार कठघरे में।

यदि वे इसे गलत बताते हैं, तो अपनी ही सरकार के केंद्रीय मंत्री पर सवाल उठता है।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं, यह मुद्दा आने वाले महीनों में सरकारी विज्ञापनों से आगे बढ़कर मौद्रिक ऑडिट, पोषण योजनाओं की जांच और स्कूल-स्तरीय निरीक्षण तक पहुँच सकता है।

पटवारी ने यह संदेश भी स्पष्ट किया:

“यह दलगत राजनीति नहीं, MP के बच्चों के भविष्य का सवाल है। कांग्रेस सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने को तैयार है।”

 

संदेश एक लाइन का हैं;

“पोषण पर राजनीति नहीं, लेकिन पोषण-बजट की लूट पर चुप्पी भी नहीं।”

 

नतीजा: मामला सिर्फ बयानबाज़ी नहीं, अब जनता “जवाब” माँग रही है

 

धर्मेंद्र प्रधान के बयान ने वह दरार खोल दी है जिसके भीतर

बजट, पोषण, ड्रॉप-आउट, भ्रष्टाचार, जवाबदेही और राजनीतिक विश्वसनीयता सब एक-साथ उजागर होते दिखाई दे रहे हैं।

अब देश और प्रदेश की निगाहें केंद्रीय मंत्री के आश्चर्य के साथ पूछे गए सवाल पर टिक गई हैं;

“अगर 37 हज़ार करोड़ शिक्षा-बजट के बाद भी बच्चे सेब-दूध तक नहीं पा रहे तो बजट आखिर गया कहाँ?”

 

और इस सवाल का जवाब अब सरकार चाहकर भी ज़्यादा दिनों तक टाल नहीं सकेगी!!

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