करोड़ों- अरबों के विकास के दावे, लेकिन बैगा गांव सड़क पर” — चाड़ा में फूटा गुस्सा, ‘विकसित भारत’ पर बड़ा सवाल न सड़क न पानी न बिजली,और न नेटवर्क

दैनिक रेवांचल टाइम्स | डिंडौरी, जिले के आदिवासी बाहुल्य ग्रामो में आज भी लोगो को मूलभूत सुविधाएं नही मिल पा रहा है सरकारी योजनाएं कागजों और ही समिट कर रह गई जहाँ इन बैगा ग्रामो में जो घने जंगलों के बीच अपना जीवन यापन करने वाले भोलेभाले गरीब लोगों सरकारी सुविधाएं नाम की भी नही मिल पा रही हैं,
जहाँ न पानी न सड़क और न ही बिजली नेटवर्क ये कैसा डिजिटल इंडिया है जहाँ कागज़ और आकड़े कुछ कहते है और जमी हकीकत कुछ और ही व्यया करती हैं आखिर कार अपनी मुलभूत सुविधाओं के लिए वनांचल में निवास रत बैगा जनजाति की महिला पुरुष सड़क में आकर चक्का जाम करने को मजबूर हो गए।
वही सरकार जहां एक ओर विकास के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये पानी की तरह बहाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर हकीकत डिंडौरी जिले के बैगा बहुल्य ग्राम चाड़ा में पूरी तरह उलट नजर आई। जिस आदिम जनजाति बैगा समाज को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष संरक्षण और सम्मान का दर्जा प्राप्त है, उसी समाज को आज अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए सड़क पर उतरकर चक्काजाम करने को मजबूर होना पड़ा।
यह केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस “विकास मॉडल” के खिलाफ सीधा आक्रोश है, जिसके दावे कागजों और भाषणों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं।
ग्राम चाड़ा, तांतर, सिलपिड़ी सहित आसपास के बैगा ग्रामीणों ने जब 6 घंटे तक शहडोल-पंडरिया मार्ग जाम किया, तो यह साफ संदेश था कि अब सिर्फ आश्वासन नहीं, जमीनी हकीकत चाहिए। बिजली नहीं, पानी नहीं, सड़क नहीं, नेटवर्क नहीं—आखिर इतने वर्षों में विकास गया कहां?
सबसे बड़ा सवाल कलेक्टर और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है—क्या इन गांवों की स्थिति से प्रशासन अनजान है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है?
सरकारी योजनाओं का ढोल पीटने वाली व्यवस्था यह जवाब दे कि जब नेटवर्क ही नहीं है तो डिजिटल योजनाओं का लाभ इन ग्रामीणों तक कैसे पहुंचेगा? जब अस्पताल में डॉक्टर नहीं, पशु चिकित्सालय खाली है, तो स्वास्थ्य और आजीविका की सुरक्षा कैसे होगी?
“विकसित भारत” का सपना दिखाने वाली सरकार के लिए यह एक कड़वी सच्चाई है—जहां एक ओर बड़े-बड़े शहरों में विकास की चमक दिखाई जा रही है, वहीं बैगा जैसे आदिवासी क्षेत्रों में लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
आखिर सवाल वही है— क्या विकास सिर्फ आंकड़ों और विज्ञापनों तक सीमित है? क्या बैगा समाज को सिर्फ योजनाओं की सूची में दिखाने के लिए छोड़ दिया गया है? और कब तक ये वंचित समाज अपनी हक की लड़ाई सड़क पर लड़ता रहेगा?