पत्रकार द्वारा नाबालिग की पहचान उजागर करने पर किशोर न्याय अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई की मांग

 

रेवाँचल टाईम्स – छिंदवाड़ा, परासिया: समाज और कानून दोनों को झकझोर देने वाले एक गंभीर मामले में, एक स्थानीय समाचार पत्र ‘मध्य स्वर्णिम’ द्वारा एक नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर की गई है। इस कृत्य ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 74 का स्पष्ट उल्लंघन किया है। पीड़ित परिवार ने इस घटना पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए पत्रकार प्रशांत शैलके और समाचार पत्र के संपादक/प्रकाशक के खिलाफ तत्काल और कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

 

घटना का विस्तृत विवरण:

12 अगस्त, 2025 को ‘मध्य स्वर्णिम’ समाचार पत्र में एक खबर प्रकाशित हुई, जिसमें न केवल नाबालिग से संबंधित संवेदनशील जानकारी को सार्वजनिक किया गया, बल्कि उसका नाम और पता भी छापा गया। यह कृत्य सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है, जो नाबालिग पीड़ितों की सुरक्षा और निजता को सर्वोपरि मानता है।

पीड़ित परिवार ने बताया कि यह गैर-जिम्मेदाराना हरकत पत्रकारिता के सभी नैतिक मूल्यों और कानूनी प्रावधानों के खिलाफ है। परिवार का कहना है, “एक मीडिया संस्थान, जिसका कर्तव्य समाज में जागरूकता फैलाना है, उसी ने हमारी बेटी के भविष्य को खतरे में डाल दिया है।” इस घटना से बच्ची सदमे में है और उसके मानसिक स्वास्थ्य पर इसका गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

कानूनी अधिकार और न्याय की मांग:

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, पीड़ित परिवार ने पुलिस अधीक्षक को एक लिखित ज्ञापन सौंपा है, जिसमें निम्नलिखित मांगें शामिल हैं:

 

तत्काल FIR दर्ज करना: पत्रकार प्रशांत शैलके और ‘मध्य स्वर्णिम’ के संपादक/प्रकाशक के खिलाफ किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 74 और अन्य संबंधित धाराओं के तहत तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाए।

 

कठोर कार्रवाई: इस गंभीर अपराध के लिए दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिले, ताकि भविष्य में कोई भी पत्रकार या मीडिया संस्थान ऐसी गलती न दोहराए।

 

जागरूकता फैलाना: प्रशासन मीडिया संस्थानों के लिए एक सख्त दिशानिर्देश जारी करे, जिसमें नाबालिगों से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग के दौरान गोपनीयता बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया जाए।

इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की एक महत्वपूर्ण लड़ाई है।

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