1926 का ऐतिहासिक पुल नहीं, प्रशासन की संवेदनहीनता ढह रही है माँ नर्मदा के आंचल में भ्रष्टाचार, लापरवाही और चोरी का खुला खेल

दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला, मंडला–महाराजपुर को जोड़ने वाला माँ नर्मदा पर बना 1926 का ऐतिहासिक पुल आज अपने सौ वर्ष पूरे कर चुका है। यह वही पुल है जिसने अंग्रेजी शासन, आज़ादी का संघर्ष, बाढ़, आपदाएँ और माँ नर्मदा के रूद्र रूप तक को झेला — लेकिन कभी झुका नहीं, कभी टूटा नहीं।
पर आज यह पुल प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि जिला प्रशासन और नगर पालिका परिषद की लापरवाही से कराह रहा है।
जो पुल बाढ़ से नहीं टूटा, उसे घटिया मरम्मत तोड़ देगी
आज पुल पर जो तथाकथित मरम्मत कार्य चल रहा है, वह मरम्मत कम और धरोहर के साथ मज़ाक ज्यादा है। घटिया सामग्री, खानापूर्ति और लीपापोती से ऐसा प्रतीत होता है मानो यह काम पुल को बचाने के लिए नहीं, भुगतान निकालने के लिए किया जा रहा हो।
सबसे बड़ा सवाल —
क्या सौ साल पुरानी ऐतिहासिक धरोहर की मरम्मत भी ठेकेदारों की कमाई का साधन बन चुकी है?

रेलिंग चोरी = प्रशासन की नाक के नीचे अपराध

वही पुल में लोगो की सुरक्षा को लेकर लागये गए रेलिंग खुलेआम चोरी हो रही है। कई हिस्सों में रेलिंग पूरी तरह गायब है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि,
न नगर पालिका को कुछ दिखता है
न जिला प्रशासन को कोई खतरा नजर आता है।
क्या यह मान लिया जाए कि जब तक कोई लाश न गिरे, तब तक कार्रवाई नहीं होगी? या किसी बड़े हादसे का इंतजार क्यों?
यह पुल प्रतिदिन सैकड़ों लोगों की जान का जिम्मा उठाए हुए है, छात्र, मजदूर, महिलाएं, बुजुर्ग और भारी वाहन। फिर भी प्रशासन की चुप्पी यह साबित करती है कि मानव जीवन से ज्यादा फाइलों और ठेकों की कीमत है।

अगर कल को कोई दुर्घटना होती है, तो क्या —
कलेक्टर जिम्मेदारी लेंगे?
नगर पालिका परिषद जवाब देगी?
या फिर जांच के नाम पर एक और फाइल खुलकर बंद हो जाएगी?
माँ नर्मदा की धरोहर पर अपराध
यह पुल सिर्फ कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं है, यह माँ नर्मदा की गोद में बैठी हमारी विरासत है। इस पर घटिया काम करना, इसकी सुरक्षा से खिलवाड़ करना, दरअसल माँ नर्मदा की आस्था के साथ अपराध है।
जनहित में चेतावनी
अब भी समय है —
पुल की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए
घटिया मरम्मत को तुरंत रोका जाए
चोरी हुई रेलिंग तत्काल लगाई जाए
दोषी ठेकेदारों और लापरवाह अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई हो
अन्यथा यह साफ मान लिया जाएगा कि —
प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागने की नीति पर काम कर रहा है।
आखिरी सवाल
सवाल सिर्फ पुल का नहीं है, सवाल है — क्या मंडला में सौ साल की धरोहर भी सुरक्षित नहीं?
क्या प्रशासन की संवेदनाएं इतनी मर चुकी हैं कि खतरा दिखता ही नहीं?
अगर आज यह पुल टूटा, तो इतिहास प्रशासन को कभी माफ नहीं करेगा।

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